आचार्यश्री ने कहा कि हम यदि केवल अपना लाभ देखकर काम करते हैं तो इससे कषाय की वृद्धि होती है। पर यही काम यदि हम परमार्थ को उद्देश्य बनाकर करते हैं तो साथ में स्वहित भी अपने आप सध जाता है। इसके साथ ही चूंकि भाव में परोपकार है, परहित है इसलिए कषाय धुलते चले जाते हैं। इसलिए स्वहित के कार्यों के लिए भी परहित को निमित्त करें।












