सामाजिक शोषण और उत्पीड़न से बचने के लिए पंथ बदलने वाले अधिकांश लोगों पर यह कहावत लागू होती है – “जात भी गंवाई और भात भी नहीं मिला”. यह बात पसमांदा मुसलमानों पर भी लागू होती है. इस्लाम भारत में शासकों का मत या पंथ रहा है. मुगल शासनकाल में बड़ी संख्या में देश के दलित समुदाय के लोग इस्लाम को मानने लगे. उन्हें लगा था कि इस्लाम को अपनाने के बाद उनका भी सम्मान बढ़ेगा, सामाजिक स्थिति बदलेगी. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. वो यहां भी दलित थे और वहां भी दलित ही बने रहे. इन्हें पसमांदा मुसलमान कहा जाता है.












