ऐसा क्या हुआ कि इन जिलों में आदिवासियों का पूरा गांव जाने लगे चर्च

ऐसा क्या हुआ कि इन जिलों में आदिवासियों का पूरा गांव जाने लगे चर्च

रायपुर। कहा जाता है कि आदिवासी उस तरह के हिन्दू नहीं हैं, जिस तरह से सनातन का प्रचार किया जाता है। उनके न केवल देवी देवता अलग होते हैं बल्कि उपासना पद्धतियां, रीति रिवाज से लेकर खान पान तक अलग होता है। सदियों से वे अपने परिवेश के साथ तालमेल बनाकर जीते आए हैं। पर उनकी पारस्थितिकी अब बिगड़ रही है। एक लंबे समय तक उनके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं था। बीमारी, अशिक्षा, कुपोषण से वे अकेले ही जूझ रहे थे।

तब चर्चों ने वहां प्रवेश किया। थोड़ा प्यार, थोड़ी मदद और एक नई जीवन पद्धति की तरफ आकर्षित करने में वो सफल रहे। भारत में नए पंथों का प्रादुर्भाव और लोगों का उनके प्रति आकर्षित होना नया नहीं है। दर्जनों ऐसे पंथों ने इसी भारत भूमि पर जन्म लिया और आज उनका अलग-अलग पहचान और आस्थाएं हैं। इस्लाम और ईसाई अलग इसलिए हैं कि उनका प्रादुर्भाव अन्य देशों में हुआ। इनसे नफरत की मूल वजह भी यही है।

फिलहाल बात करते हैं छत्तीसगढ़ की। छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण की जड़ें गांव-गांव तक फैल चुकी हैं। जशपुर, अंबिकापुर और रायगढ़ में गांव के गांव ईसाई धर्म को मानने लगे हैं। बस्तर से लेकर सरगुजा संभाग के सैकड़ों आदिवासी गांवों में ईसाई बहुसंख्यक हैं।

जिन आदिवासी गांवों में एक मंदिर भी नहीं है, लेकिन 3-3, 4-4 चर्च का होना सामान्य हैं। आदिवासी अपनी परंपरा के विपरीत शवों का दाह संस्कार नहीं कर रहे, दफना रहे हैं। कब्रों पर क्रॉस बनाए जा रहे हैं। दैनिक भास्कर ने 5 जिलों के 20 गांवों की  पड़ताल की। सामने आया कि गरीब, बीमार, समाज से उपेक्षित परिवार ईसाई बन गए। गांव-गांव में 2-2, 3-3 पास्टर धर्म का प्रचार कर रहे हैं। धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं।

उधर, केंद्रीय गृहमंत्रालय अंतर्गत विदेशी अंशदान अधिनियम विनियम (एफसीआरए) तहत राज्य में 146 एनजीओ रजिस्टर्ड हैं, इनमें 50 मिशनरीज हैं। इन्होंने अपने कार्यक्षेत्र (नेचर) में ​धार्मिक, शिक्षा और सामाजिक बताया है। 50 में से 30 एनजीओ जशपुर, अंबिकापुर, रायगढ़ और बस्तर में काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि इन्हीं जिलों में धर्मांतरण भी सबसे ज्यादा हो रहा है।

ये एनजीओ छत्तीसगढ़ फर्म एंड सोसाइटी में भी रजिस्टर्ड हैं लेकिन सोसाइटी इनका ऑडिट नहीं करवाती। एनजीओ अपनी ऑडिट रिपोर्ट खुद जमा करते हैं। उधर, राज्य सरकार के पास इन एनजीओ को मिलने वाली फॉरेन फंडिंग की कोई पुख्ता जानकारी नहीं है।

अमेरिका के ‘द टिमोथी इनिशिएटिव (टीटीआई)’ का पैसा अमेरिकी बैंक में जमा है। इसमें से 6.5 करोड़ रुपए डेबिट कार्ड के जरिए धमतरी और बस्तर के एटीएम से निकाले गए। ईडी की जांच में खुलासा हुआ है​ कि इस फॉरेन फंडिंग का इस्तेमाल बड़े स्तर पर गांव-गांव में चर्च निर्माण, पास्टर की नियुक्तियों में हो रहा है।

धर्मांतरण के बढ़ते मामलों, विवादों को देखते हुए ही सरकार धर्म स्वातंत्रय विधेयक 2026 लेकर आई है। इसका उद्देश्य एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के लिए बल प्रयोग, प्रलोभन, कपटपूर्ण नीति या साधनों, अनुचित प्रभाव या मिथ्या निरूपण पर प्रभावी ढंग से रोक लगाना है।

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