परवरिश : पिता मेरी लाश को हाथ भी न लगाएं; क्यों कहा प्रियांशु ने ऐसा
कानपुर कचहरी में अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव ने पांचवीं मंजिल से छलांग लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। प्रियांशु ने यह आत्मघाती कदम अपने पिता राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव की कथित सख्ती और मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर उठाया। मृतक ने आत्महत्या से ठीक पहले व्हाट्सएप पर दो पन्नों का स्टेटस नोट साझा किया था। इस नोट में उन्होंने बचपन की कड़वी यादों और वर्तमान की बंदिशों का विस्तार से जिक्र किया। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और व्हाट्सएप स्टेटस को जांच का मुख्य आधार बनाया है।
इतनी नफरत कोई बच्चा अपने पेरेंट्स से क्यों करेगा? कोई तो वजह होगी। दरअसल, इसका जवाब छिपा है पेरेन्ट्स की अपने बच्चों के साथ बदलते समीकरणों की। भारतीय परिवारों में रिश्तेदारों की भरमार हुआ करती थी। पिता हमेशा सख्ती से पेश आता रहा होगा, पर किशोर मन की बातों को सुनने-समझने वालों की भी कभी कमी नहीं थी। तमा्म रिश्तेदार उसके आसपास थे। पर अब हालात बदल गए हैं। बच्चे के पास वयस्क के रूप में या तो उनके माता पिता या फिर शिक्षक ही होते हैं। ये तमाम भूमिकाएं उन्हें अदा करनी पड़ती हैं। यदि वो फेल हो गए तो बच्चे “प्रियांशु” बन सकते हैं।
प्रियांशु ने अपने दो पेज के सुसाइड नोट में लिखा : करीब 24 वर्ष की उम्र में जान देने वाले प्रियांशु ने लिखा कि लॉ 2025 में किया है। बचपन में छह साल की उम्र में चुपके से फ्रिज में रखा मैंगोशेक पी लेने पर पिता ने निर्वस्त्र कर घर से निकाल दिया था। वह शर्मिंदगी जहन में बैठ गई। आगे लिखा कि पढ़ाई के लिए दबाव, अधूरी तैयारी पर पीटना तो फिर भी ठीक था लेकिन हर पल शक की नजर से देखना हर मिनट का हिसाब लेना, कहीं न कहीं मानसिक टार्चर ही रहा।
प्रियांशु को बचपन से केवल डांट फटकार ही मिली। पिता एक सफल वकील थे। बेटे को भी वकील बनाया। उसकी हर गलती या चूक को उसकी कमी या मूर्खता कहते रहे। धीरे धीरे बच्चे के मन में यह बात गहरे बैठ गई कि वह निकम्मा है। उससे कोई भी काम ठीक से नहीं होता। उसमें हीनभावना खतरनाक स्तर तक समा गई और एक दिन उसने खुद अपनी जान ले ली।
जब किसी बच्चे को बार-बार डांटा जाता है, सजा दी जाती है, अपमानित किया जाता है या डराया जाता है, तो उसका दिमाग इसे लगातार खतरे की स्थिति मानने लगता है। ऐसे में शरीर का तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) लंबे समय तक ज्यादा सक्रिय रहता है। इसका असर दिमाग के उस हिस्से पर पड़ता है, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं, जो सही-गलत समझने, फैसले लेने और भावनाओं को संभालने में मदद करता है। धीरे-धीरे बच्चा ‘सर्वाइवल मोड’ में जीने लगता है और वह खुलकर सोच नहीं पाता और हर समय डर के आधार पर प्रतिक्रिया देता है।
ये बच्चे बड़े होकर अक्सर यह मान लेते हैं कि वे अच्छे नहीं हैं या उनमें ही कोई कमी है। बहुत सख्त और भावनात्मक रूप से दूर रहने वाले माता-पिता के माहौल में पलने वाले बच्चे अक्सर स्वस्थ आत्मविश्वास विकसित नहीं कर पाते। जब माता-पिता हर बात को कंट्रोल करते हैं, हर समय नजर रखते हैं, भरोसा नहीं करते और प्यार या स्नेह नहीं दिखाते, तो बच्चा सोचने लगता है कि वह अच्छा नहीं है और उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
ऐसी सोच से घिर जाने वाले बच्चों में कुछ बदलाव दिखने लगते हैं, जैसे अकेले रहना, सबको खुश करने की कोशिश करना या अचानक गुस्सा आना। भावनात्मक रूप से वे अक्सर चिंता और उदासी महसूस करते हैं और छोटी-छोटी असफलताओं को भी सहन नहीं कर पाते। बड़े होने पर यही बातें आत्म-संदेह में बदल जाती हैं।
जिस बच्चे को बार-बार अपमानित किया जाता है, उसे यह मानना मुश्किल हो जाता है कि कोई उसे सच में पसंद कर सकता है या उसकी कदर कर सकता है। इसे कॉम्प्लेक्स ट्रॉमा कहा जाता है, और इसका असर लंबे समय तक व्यक्ति के व्यवहार, भावनाओं और खुद के बारे में सोच पर पड़ता है।
हालांकि, अच्छी बात यह है कि इसका इलाज संभव है। थेरेपी, खासकर ट्रॉमा से जुड़ी थेरेपी, लोगों को अपने पुराने अनुभवों को समझने और बदलने में मदद करती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी समस्या को स्वीकार करें, उसे दबाकर न रखें।
पेरेंट्स को किन लक्षणों पर देना चाहिए :
पढ़ाई में अचानक रुचि कम होना, दोस्तों और पसंदीदा गतिविधियों से दूरी बनाना, नींद या भूख में बदलाव आना,
बिना किसी बीमारी के बार-बार सिरदर्द या पेट दर्द की शिकायत, खुश न रहना, हंसी-मजाक में कमी आना,
घर जाने से डरना या असहज महसूस करना
गंभीर संकेत :
अपनी चीजें दूसरों को देना, खुद को बोझ समझना, निराशा या हार मानने वाली बातें करना। इन संकेतों को ‘टीनएजर की समस्या’ या ‘बुरा समय’ कहकर नजरअंदाज न करें। अगर बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव दिखे, तो उससे प्यार और समझ के साथ बात करें।












