भारत में क्यों बढ़ रहा है चिकित्सा पेशेवरों से दुर्व्यवहार ?
डॉ देवेन्द्रनाथ शर्मा
चिकित्सकों का समाज में हमेशा सम्मान रहा है l रुग्ण व्यक्तियों की शारीरिक व मानसिक पीड़ा को कम करने व उन्हें चंगा कर देने के लिए दिन-रात लगन से सेवा देने वाले चिकित्सकों की सामाजिक प्रतिष्ठा सर्वोपरी रही है | परन्तु कुछ वर्षों से चिकित्सकों व अन्य स्वास्थ्य प्रदायकों से रोगी या उनके परिजनों द्वारा मौखिक या हिंसात्मक दुर्व्यवहार के मामले तेजी से बढे हैं l इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार देश के 75% चिकित्सकों ने कभी-न-कभी मौखिक या भौतिक दुर्व्यवहार का सामना किया है |
भारत अपनी जीडीपी का मात्र 2% ही चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है | इतने कम बजट में देश के डेढ़ अरब की जनसँख्या तक मानक स्वास्थ्य सेवाओं को संतोषजनक ढंग से पंहुचाना कठिन है | सरकारी अस्पतालों व स्वास्थ्य केन्द्रों पर आदर्श संख्या में चिकित्सकों व अन्य स्वास्थ सेवा प्रदाताओं की तैनाती कम या नहीं होना, उनकी अनुपस्थिति या लेट-लतीफी दूर-दराज से आने वाले गरीब मरीजों व उनके परिजनों में असंतोष पनपाता है | इन सरकारी केन्द्रों में मरीजों को रोग निदान हेतु आवश्यक जांच सुविधाएँ, उपचार व अन्य सेवाएं की असंतोषजनक प्रदायकी, बदइन्तजामी व लापरवाही, अवैध बसूली और मरीजो के प्रति सेवा प्रदाताओं का अपमानजनक रवैय्या, ऐसे प्रमुख कारण हैं जिनसे आक्रोशित होकर रोगी के परिजन मौखिक व भौतिक दुर्व्यवहार कर बैठते हैं l अस्पताल की लापरवाही से मरीज की हालत ज्यादा बिगड़ने या मौत हो जाने की स्थिति में रोगी के उत्तेजित परिजन व मित्र कभी कभी मार-पीट या तोड़फोड़ जैसे हिंसात्मक कृत्य भी कर देते हैं l
सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों व नर्सिंग होमों में चिकित्सकों को मौखिक या भौतिक हिंसा की स्थितियों से अपेक्षाकृत ज्यादा गुजरना पढ़ता है | निजी चिकित्सा संस्थानों में रोग निदान, उपचार व नर्सिंग सेवाओं के लिए अच्छा-खासा भुगतान मरीजों को करना पड़ता हैं l जब वांछित परिणाम नहीं मिलता है तो उनका असंतोष कभी-कभी आक्रामकता का कोई भी रूप ले लेता है | निजी अस्पतालों में ऐसी आक्रामक घटनाएँ अक्सर गंभीर किस्म के मरीजों के जीवित या मृत अवस्था में डिसचार्ज करने समय ज्यादा होती हैं | अस्पताल में असंतोषजनक उपचार से मरीज के जीवित न रह पाने के बाद आईसीयू, रेस्पीरेटर आदि का भारी-भरकम बिल के भुगतान के बिना मृतक का शव नहीं मिलने का दबाव मानसिक रूप से मरीज के परिजनों को व्यथित कर देता है | लम्बे समय तक भर्ती रहने के बाद भी मरीज के रोग का सही निदान न हो पाने अथवा उपयुक्त उपचार के न मिलने, आयुष्मान कार्डधारी से भी अवैध वसूली करने की अवस्था में बिल भुगतान को लेकर मरीज के परिजन डिस्चार्ज के समय आवेश में आकर विवाद कर लेते हैं जिससे कभी-कभी तनातनी की स्थिति बन जाती है l कुछ निजी अस्पतालों के विषय में आम धारणा यह भी है कि इन अस्पतालों में अनावश्यक परिक्षण कराये जाते हैं, आईसीयू में मरीज को वगैर जरुरत या जरुरत से अधिक दिनों तक भर्ती रखने या वेंटीलेटर पर जबरन रखने की कोशिश रहती है, ज्यादा दवाइयाँ मंगवाई जाती है जबकि लगती कम हैं | ऐसी धारणाओं के चलते मरीज व उसके परिजन अपने को उत्पीड़ित व ठगा महसूस कर कभी-कभी आक्रामक हो जाते हैं | संगीन मारपीट या तोड़फोड़ जैसी हिंसात्मक घटनाएँ कभी-कभी कुछ नेतानुमा लोगों के भड़काने पर विकराल रूप ले लेती हैं | यह देखा गया है कि अधिकतर बेजा मुनाफाखोरी की नियत से संचालित निजी अस्पतालों में ऐसी हिंसक घटनाएं आपेक्षाकृत अधिक होती हैं |
आईएमए व अन्य स्वास्थ्य सेवा प्रदायकों के संगठनों की लगातार मांग के फलस्वरूप स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों तथा नैदानिक संस्थानों के विरुद्ध हिंसा से सुरक्षा देने संबंधी बिल को केंद्र सरकार ने 2022 में संसद में पेश किया गया था किंतु यह बिल अब तक पारित नहीं हो सका है l हालाकि, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आँध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल व केरल राज्यों ने अपने राज्य में चिकित्सा सेवा व्यक्तियों और संस्थाओं की सुरक्षा हेतु अधिनियम लागू किये है l इन अधिनियमों के तहत 3-5 साल तक की सजा तथा जुर्माने का प्रावधान है l किन्तु देश के सभी राज्यों में ऐसे अधिनियम लागू नहीं है l
क्या केवल कानूनों से ऐसा दुर्व्यवहार तथा हिंसा को रोका जा सकता है ? स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को रोगियों व उनके परिजनों की मनो-स्थितियों को समझ कर उसके अनुरूप अपने व्यवहार में सुसंगत परिवर्तन लाना होगा | ऐसी हिंसात्मक परिस्थितियों से निपटने के लिए यह तर्कसंगत है कि रोगियों, विशेषकर गंभीर किस्म के रोगियों उनके परिजनों से चिकित्सक के बीच सुसंगत संबाद एवं व्यवहार हो तो समस्या का बहुत कुछ रोकथाम संभव है | सरकारी सेवा प्रदाताओं व निजी अस्पतालों द्वारा नाजायज वसूली पर लगाम लगाना भी आवश्यक है l यह जरुरी लगता है कि अस्पताल प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में ऐसे हिंसात्मक व्यवहार का सामना करने और इनसे बचाव के सुरक्षारात्मक उपायों व जतनों पर प्रभावी शिक्षण-प्रशिक्षण दिया जावे | साथ ही, चिकित्सा महाविधालयों में स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में ऐसी हिंसात्मक घटनाओं से बचने, रोगी एवं उनके परिजनों से मनोवैज्ञानिक आधार पर संवाद बनाने के तरीकों तथा व्यवहारगत बारीकियों के विषय में शिक्षण-प्रशिक्षण देने का प्रावधान बनाया जाना चाहिए |
-डॉ देवेन्द्र नाथ शर्मा
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