यूनेस्को हेरिटेज में शामिल है मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत बैसाखी पर्व

यूनेस्को हेरिटेज में शामिल है मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत बैसाखी पर्व

डॉ. रामजीलाल : बैसाखी का त्योहार सामाजिक समरसता, एकता, धर्मनिरपेक्षता, बलिदान और समर्पण का प्रतीक है। 2016 में यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया।
बैसाखी, वैशाख माह का प्रसिद्ध धार्मिक त्योहार है। यह वैशाख सौर मास का प्रथम दिन होता है। इस दिन सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है। इसलिए बैसाखी को मेष संक्रान्ति व विषुवत संक्रान्ति के नाम से भी संबोधित किया जाता है। बैसाख (वैशाख) के प्रथम दिन अनेक क्षेत्रों में ‘सोलर नववर्ष’ के त्योहार जैसे जुड़ शीतल, पोहेला बोशाख, बोहाग बिहू, विशु, व पुथण्डु भी मनाया जाता है। मान्यता अनुसार 13 अप्रैल, 1699 को दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा ‘सिख धर्म’ की स्थापना की गई थी। बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा ‘बुद्ध पूर्णिमाÓ को त्योहार के रूप में मनाया जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह सौर कैलेंडर का प्रथम दिन है व हिंदू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लगभग 3000 वर्ष पूर्व राजा भागीरथ मुनि के रूप में कई वर्ष कठोर तपस्या के बाद गंगा नदी को पृथ्वी पर लेकर आए थे। इसे गंगा नदी अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। फलत: गंगा स्नान का विशेष महत्व है।
इस त्योहार का कृषक बिरादरी से घनिष्ठ संबंध है। इस दिन तक रबी की फसल-गेहूं, जौ, चना इत्यादि कटाई के लिए तैयार हो जाती है। बैसाखी के दिन को शुभ दिन मान कर गेहूं की कटाई करना समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। किसान प्राकृतिक आपदाओं से बचकर फसल पकने की खुशी मनाते हैं। इस दिन परंपरा के रूप में फसल की कटाई की जाती है। पंजाबी इस दिन उत्सव मनाते हैं।
सिख धर्म में बैसाखी पवित्र व सर्वोत्तम त्योहार के रूप में मनाया जाता है। 13 अप्रैल, 1699 को आनंदपुर साहिब में सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने पंज प्यारों को दीक्षा देकर सिख धर्म की स्थापना की थी। ये पंज प्यारे भाई दया सिंह (खत्री-लाहौर), भाई धर्म सिंह (जाट हस्तिनापुर यूपी), भाई हिम्मत सिंह (झीउर-जगनाथपुरी-ओडिशा), भाई मोहकम सिंह (दर्जी-द्वारका-गुजरात) व भाई साहब सिंह (नाई-बीदर-कर्नाटक) विभिन्न क्षेत्रों व जातियों से सम्बंधित थे। बैसाखी के दिन गुरु गोविंद सिंह ने जब हिन्दू धर्म रक्षा हेतु पांच शीष मांगे तो यह पांचों बहादुर अनुयायी बिना विलम्ब तैयार हो गए। गुरुजी ने इनको अमृतपान कराया और सिंह की उपाधि देकर, सिख की एक विशेष पहचान निश्चित करते हुए पांच ‘क’—केस, कंघा, कड़ा, कछेरा व कृपाण धारण करने का संदेश दिया। तब से बैसाखी पवित्र त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा।
बैसाखी को भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड में ‘बिखोती’ का महत्व है। उत्तराखंड के निवासी हरिद्वार व ऋषिकेश में गंगा नदी में स्नान को पवित्र मानते हैं। असम में ‘बोहाग’, ‘बिहू’, ‘रंगली बिहू’, ‘असमिया नववर्ष’ व ‘बोहाग कैलेंडर’ के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में 14 अप्रैल को ‘पाहेला बेसाख’ के रूप में मनाया जाता है तथा त्रिपुरा और बंगाल में शोभा यात्राएं भी निकाली जाती हैं। तमिलनाडु में पुत्थांडु, पुथुवरूषम-तमिल नववर्ष या तमिल कैलेंडर के रूप में इस त्योहार को मनाते हैं। बिहार और मिथिला क्षेत्र में इसे जुर शीतल के रूप में मनाया जाता है। भारत के पड़ोसी मुल्कों-नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में यह त्योहार मनाया जाता है। बैसाखी के दिन, 13 अप्रैल, 1919 अमृतसर के जलियांवाला बाग में रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्ण विरोध करने के लिए एक जनसभा आयोजित की गई, जिसमें लगभग 20,000 व्यक्ति मौजूद थे। भारतीयों की आवाज को दबाने के लिए ब्रिगेडियर जनरल रिचर्ड डायर ने सैनिक टुकड़ी के साथ घटना स्थल पर पहुंच बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने का आदेश दिया। परिणामस्वरूप 10 मिनट में 1650 राउंड की फायरिंग में अमृतसर के सिविल सर्जन डॉक्टर सुमित के अनुसार लगभग 1800 भारतीयों की जान चली गई थी। उधम सिंह वहां मौजूद थे और उन्होंने कसम उठाई कि वह नरसंहार का बदला लेकर रहेगा। यद्यपि वह ब्रिगेडियर जनरल रिचर्ड डायर को मौत के घाट उतारना चाहता था परंतु उसकी मृत्यु 23 जुलाई, 1927 को हो चुकी थी। 13 मार्च, 1940 को कैक्सटन हॉल, लंदन में जब माइकल ओ’डॉयर एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे उधम सिंह ने उसको मौत के घाट उतार कर जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लिया। 31 जुलाई, 1940 को उधम सिंह को माइकल ओ’डॉयर की हत्या के आरोप में फांसी दे दी गई।
बैसाखी का त्योहार सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह सामाजिक समरसता, एकता, धर्मनिरपेक्षता, बलिदान और समर्पण को बढ़ावा देता है। इसीलिए सन् 2016 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने मंगल शोभा यात्रा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में सम्मिलित करके इसके महत्व को और बढ़ाया है।
लेखक दयाल सिंह कॉलेज, करनाल के पूर्व प्राचार्य हैं।

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