तीस साल बिस्तर में रहने के बाद वैश्विक मंच पर बनाई अपनी पहचान

तीस साल बिस्तर में रहने के बाद वैश्विक मंच पर बनाई अपनी पहचान

धमतरी। माँ केवल जन्म ही नहीं देती, वह शक्ति का स्रोत बनकर तब तक साथ खड़ी रहती है जब तक कि उसका बच्चा कुछ बन नहीं जाता। कुछ ऐसी ही है अहिल्याबाई साहू की कहानी। उसका पुत्र बसंत साहू 95 प्रतिशत दिव्यांग था। लगभग तीन दशकों तक वह बिस्तर पर ही पड़ा रहा। पर मां ने हिम्मत नहीं हारी और लगी रही। बसंत ने चित्रकारी सीखी और मां की प्रेरणा से अपनी पूरी शक्ति को उसी दिशा में लगा दिया। आज बसंत के चित्र वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त कर रहे हैं।

तीस साल बिस्तर में रहने के बाद वैश्विक मंच पर बनाई अपनी पहचान

धमतरी जिले के कुरुद निवासी चित्रकार बसंत साहू बिस्तर पर ही रहने को मजबूर थे। साल 1995 में हुए एक सड़क हादसे ने बसंत साहू की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। हादसे में उनकी स्पाइनल कॉर्ड गंभीर रूप से प्रभावित हुई, जिसके बाद गले के नीचे का पूरा शरीर निष्क्रिय हो गया। डॉक्टरों ने उम्मीद लगभग छोड़ दी थी, लेकिन माँ अहिल्याबाई ने परिस्थितियों के आगे हार मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने बेटे को निराशा से बाहर निकालने का बीड़ा उठाया और हर पल उसका हौसला बनकर खड़ी रहीं।
बसंत की देखभाल के दौरान अहिल्याबाई खुद भी गंभीर बीमारी से लड़ रही थीं। ब्रेस्ट कैंसर जैसी तकलीफ झेलने के बावजूद उन्होंने बेटे की सेवा और हिम्मत में कभी कमी नहीं आने दी। परिवार की कठिन परिस्थितियों के बीच माँ का यही अटूट विश्वास बसंत के जीवन का सबसे बड़ा सहारा बना। धीरे-धीरे उन्होंने रंगों और कैनवास के जरिए अपनी नई दुनिया बना ली।
शारीरिक रूप से असहाय होने के बावजूद बसंत साहू ने पेंटिंग को अपनी पहचान बना लिया। उनकी कलाकृतियों में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, संघर्ष और संवेदनाएं जीवंत दिखाई देती हैं। उनकी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। उत्कृष्ट चित्रकारी के लिए उन्हें राष्ट्रपति सम्मान प्रदान किया गया। उनकी बनाई पेंटिंग्स देश की प्रतिष्ठित जगहों और विदेशी आर्ट गैलरीज तक पहुंच चुकी हैं।
अपनी माँ से मिले संस्कारों को आगे बढ़ाते हुए बसंत साहू ने “बसंत फाउंडेशन” की स्थापना की। यह संस्था विशेष रूप से बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त कला प्रशिक्षण दे रही है। संस्था दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का काम भी कर रही है। कई प्रतिभाशाली छात्र यहां से निकलकर खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय जैसे बड़े संस्थानों तक पहुंच चुके हैं।
बसंत साहू कहते हैं कि उनकी माँ ने केवल उन्हें संभाला नहीं, बल्कि जिंदगी को नए नजरिए से जीना सिखाया। आज जो भी पहचान उन्हें मिली है, वह पूरी तरह माँ के त्याग और विश्वास का परिणाम है। अहिल्याबाई साहू की कहानी उन तमाम माताओं के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिवार के लिए मजबूती से खड़ी रहती हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि माँ का प्यार केवल ममता नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और नई उम्मीद की सबसे बड़ी ताकत होता है।

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