पंडवानी को अमर कर गईं डॉ तीजन; पैतृक गांव गनियारी में राजकीय सम्मान से अंतिम विदाई

पंडवानी को अमर कर गईं डॉ तीजन; पैतृक गांव गनियारी में राजकीय सम्मान से अंतिम विदाई

रायपुर/भिलाई। कापालिक शैली में पण्डवानी सुनाने वाला पहला महिला स्वर खामोश हो गया। तंबूरे पर महाभारत को जीवंत करने वाली पद्मविभूषण डॉ तीजन बाई ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।  तीजन बाई ने दशकों तक भीष्म की प्रतिज्ञा, अर्जुन के गांडीव, द्रौपदी की पीड़ा और कृष्ण के संदेश को अपनी ओजस्वी वाणी (आवाज) में जीवंत किया था। रविवार तड़के करीब 3.15 बजे रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं।

डॉ. तीजन बाई के निधन से न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के कला एवं सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उन्होंने अपने अद्वितीय गायन, प्रभावशाली अभिनय और ओजपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से पंडवानी जैसी लोककला को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। महाभारत की कथाओं को जीवंत शैली में प्रस्तुत करने की उनकी विलक्षण कला ने देश-विदेश के असंख्य दर्शकों को भारतीय लोकसंस्कृति से जोड़ने का कार्य किया।

ग्रामीण परिवेश से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, साधना और समर्पण का अनुपम उदाहरण है। अनेक सामाजिक एवं आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर ऐसी पहचान बनाई, जिसने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढि़यों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी।

रविवार सुबह करीब 10.30 बजे जब पार्थिव शरीर उनके गृह ग्राम गनियारी पहुंचा, तो गांव शोक में डूब गया। जिस आंगन से कभी पंडवानी की गूंज उठती थी, वहीं आज सन्नाटा था। अंतिम दर्शन के लिए लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा।

जनप्रतिनिधि, कलाकार, रंगकर्मी, साहित्यकार, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और ग्रामीण अपनी प्रिय लोक कलाकार को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। दोपहर करीब 12.30 बजे उनकी अंतिम यात्रा निकली। राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। पुलिस जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया।

सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब मुखाग्नि से पहले उनके साथी कलाकार चिता के समीप खड़े हुए और निरगुण काया खंडी भजन “चोला माटी के हे राम, काया तो माटी हे न…” गाने लगे। भजन की करुण धुन के बीच उपस्थित लोगों की आंखें छलक उठीं।

इसके बाद पुत्र दिलहरण पारधी ने मुखाग्नि दी और पंडवानी की वह अमर साधिका पंचतत्व में विलीन हो गई। अंतिम विदाई देने स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, सांसद विजय बघेल, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, विधायक ललित चंद्राकर, रिकेश सेन और अनुज शर्मा पहुंचे।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति – मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने एम्स, रायपुर पहुंचकर पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उन्होंने शोकाकुल परिजनों से भेंट कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉ. तीजन बाई ने अपनी अद्वितीय कला-साधना और विलक्षण प्रतिभा से उन्होंने पंडवानी को विश्व पटल पर विशिष्ट पहचान दिलाई तथा छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया। डॉ. तीजन बाई का निधन छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है। इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, विधायक  पुरंदर मिश्रा सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण उपस्थित थे।

 पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने दी श्रद्धांजलि

डॉ. तीजन बाई शासकीय हाई-हायर सेकेंडरी विद्यालय

शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव ने कहा कि डॉ. तीजन बाई का संपूर्ण जीवन लोकपरंपराओं, संस्कृति और कला के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समर्पित रहा। उनकी कला साधना, संघर्ष और उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विश्व पटल पर स्थापित करने में उनका योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। डॉ. तीजन बाई के सम्मान में उनके गृहग्राम गनियारी स्थित शासकीय हाई-हायर सेकेंडरी स्कूल का नामकरण “डॉ. तीजन बाई शासकीय हाई-हायर सेकेंडरी विद्यालय, गनियारी” के नाम से किया जाएगा।

डॉ. तीजन बाई के सम्मान में गनियारी के शासकीय हाई-हायर सेकेंडरी स्कूल का होगा नामकरण – शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव

तीजन ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। अपनी व्यस्त जीवनचर्या के बीच किसी तरह नवसाक्षर बनी।  तीजन बाई विदेशों में भी अपने प्रशंसकों को अंग्रेजी में TBai लिखकर ऑटोग्राफ देती थीं। गरीबी के कारण बचपन में वे स्कूल नहीं जा पाईं। बाद में प्रौढ़ शिक्षा के जरिए थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना सीखा।

सम्मान

पद्मश्री -1988
पद्म भूषण- 2003
पद्म विभूषण -2019
संगीत नाटक अकादमी- 1995
(बिलासपुर, रविशंकर और खैरागढ़ विश्वविद्यालयों ने डी.लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 80 के दशक में भारत की सांस्कृतिक दूत बनकर जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, स्विट्जरलैंड और रोमानिया समेत 15 देशों की यात्रा)।

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