वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन की मिसाल बने सिलघट के 75 वर्षीय धनऊ सोनकर
धमतरी। जिले के ग्राम सिलघट निवासी 75 वर्षीय धनऊ (भजनाहा) सोनकर वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन की मिसाल बन गए हैं। एवीएफओ के मार्गदर्शन और मदद से वे न केवल अपने दुधारू पशुओं का उत्पादन बढ़ा रहे हैं बल्कि नस्ल सुधार में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। वे अपने पशुओं के लिए हरे चारे का प्रबंध आज भी स्वयं ही करते हैं।
सोनकर प्रतिदिन सुबह स्वयं खेतों से मवेशियों के लिए हरा चारा काटते हैं और उसे साइकिल से घर तक लाते हैं। वर्तमान में उनके पास एक एचएफ × जर्सी संकर गाय, एक गिर × जर्सी संकर गाय, एक गिर नस्ल की बछिया तथा एक बछड़ा सहित कुल चार गौवंशीय पशु हैं। इनकी देखभाल का पूरा दायित्व वे स्वयं निभाते हैं।
पिछले कई वर्षों से वे अपने पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination) नियमित रूप से कराते आ रहे हैं। जैसे ही उनकी गाय हीट में आती है, वे लगभग 4 किलोमीटर साइकिल चलाकर क्षेत्र के एवीएफओ चंद्रशेखर निर्मलकर के पास पहुँच जाते हैं। वे बेहतर नस्ल और अधिक दुग्ध उत्पादन के लिए वैज्ञानिक तरीकों के प्रति पूरी तरह समर्पित हैंं।
एवीएफओ चंद्रशेखर निर्मलकर बताते हैं कि पिछले 11 वर्षों से, जब से उनकी इस क्षेत्र में पदस्थापना हुई है, तब से धनऊ सोनकर अपने पशुओं में नियमित कृत्रिम गर्भाधान कराकर नस्ल सुधार अभियान में निरंतर सहयोग कर रहे हैं। ऐसे जागरूक पशुपालकों के कारण ही क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाली दुग्ध उत्पादक नस्लों का विकास संभव हो पाया है।
सोनकर प्रत्येक वर्ष अवांछित (नाटे) नस्ल के सांडों का बधियाकरण कराते हैं। अपने सभी पशुओं का खुरपका-मुंहपका (FMD), गलघोटू (HS), लम्पी स्किन डिजीज (LSD) सहित सभी आवश्यक टीकाकरण समय पर सुनिश्चित करते हैं। पशुओं के स्वास्थ्य, नस्ल सुधार और वैज्ञानिक प्रबंधन को वे सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।
सोनकर का मानना है कि पशुपालन ग्रामीण परिवारों की आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार है। नियमित देखभाल, संतुलित पोषण, समय पर उपचार और वैज्ञानिक प्रबंधन से पशु स्वस्थ रहते हैं, दुग्ध उत्पादन बढ़ता है और परिवार की आय में भी निरंतर वृद्धि होती है।
जिले में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए शासन द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पशुपालकों को तकनीकी मार्गदर्शन, कृत्रिम गर्भाधान, नस्ल सुधार, टीकाकरण, पशु स्वास्थ्य सेवाएं तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाना और पशुपालन को लाभकारी एवं टिकाऊ आजीविका के रूप में विकसित करना है।
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