कैस्पियन कोबरा के डंसने से हिमाचल के चंबा में दो की मौत
शिमला। मध्य एशिया के जहरीले सांपों में से एक कैस्पियन कोबरा भारत के हिमाचल प्रदेश में एंट्री ले ली है। नाजा ऑक्सियाना यानी कैस्पियन कोबरा के काटने से हिमाचल के चंबा में दो लोगों की मौत हो चुकी है। रिसर्च में यह सामने आया है कि इस जहरीले सांप ने उत्तर पश्चिमी हिमालय में अपना दायरा बढ़ाया है। स्थानीय रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इसका दायरा धीरे-धीरे कम ऊंचाई वाले इलाकों की ओर भी बढ़ रहा है। यह सांप इतना खतरनाक है कि इसके डंसने के आधे घंटे के भीतर पीड़ित की मौत हो जाती है।
एपिडेमियोलॉजी इंटरनेशनल जर्नल में छपी एक स्टडी के मुताबिक, कैस्पियन कोबरा को सेंट्रल एशियन कोबरा (नाजा ऑक्सियाना) के नाम से जाना जाता है। इस सांप की प्रजाति मूल रूप से मध्य एशिया की है, लेकिन इसकी मौजूदगी हिमाचल प्रदेश के ऊंचे इलाके में दर्ज की गई है। चंबा इलाके में इसके काटने से दो लोगों की मौत भी हो चुकी है। चूंकि यह सांप भारत में नहीं पाया जाता था, इसलिए यहां इसका एंटी वेनम भी मौजूद नहीं है। भारत में सांप की चार प्रजाति स्पेक्टेकल्ड कोबरा, रसेल वाइपर, कॉमन क्रेट और सॉ-स्केल्ड वाइपर होती है। स्थानीय स्तर पर इसके इलाज के लिए एंटी वेनम अस्पतालों में उपलब्ध है।
डॉ. ओमेश कुमार भारती की अगुवाई में रिसर्च कर रही टीम ने पाया कि कैस्पियन कोबरा की जेनेटिकल कन्फर्मेशन 2019 में चंबा में हुई थी। इसके बारे में पाकिस्तान और कश्मीर से भी जानकारी मिली है। इसके काटने से पहली मौत 6 जुलाई 2020 को हुई थी। उल्लांसा गांव का एक 40 वर्षीय व्यक्ति सेब के बाग में स्प्रे करते समय गलती से कैस्पियन कोबरा पर पैर रख बैठा। सांप ने उसके पैर में दो बार डंसा। उसे पहले एक स्थानीय झाड़-फूंक करने वाले के पास ले जाया गया और फिर भरमौर के सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। इस खतरनाक कोबरे के दंश से मरने वाला दूसरा व्यक्ति चुराह घाटी के भंजराड़ू गांव के एक 62 वर्षीय व्यक्ति का था। 7 जुलाई 2021 को उसका पैर गलती से एक सांप पर पड़ गया। सांप ने उसके बाएं पैर में काट लिया। स्वास्थ्य केंद्र ले जाते समय आधे घंटे के भीतर ही वह गिर पड़ा।
मिर्चाड़ी जड़ी-बूटी के इलाज से दो बच भी गए
रिसर्च के मुताबिक, नाजा ऑक्सियाना यानी कैस्पियन कोबरा आमतौर पर ऊंचे, खुले और पथरीले इलाकों में रहता है। हिमाचल के चंबा में यह प्रजाति लगभग 2,000 मीटर और उससे अधिक ऊंचाई पर देखा गया। स्टडी के दौरान दो लोग ऐसे भी मिले, जो इसके जहर से बच गए। खास यह है कि दोनों का इलाज एंटी वेनम से नहीं, बल्कि जड़ी-बूटियों से किया गया। मिर्चाड़ी के नाम से जानी जाने वाली जड़ी-बूटी की पहचान पेरगुलारिया डेमिया के रूप में की गई, जिसे आमतौर पर ट्रेलिस वाइन के नाम से जाना जाता है। रिसर्च में बताया गया है कि जड़ी-बूटी से इलाज का मूल्यांकन जरूरी है। साथ ही, इस कैस्पियन कोबरा के लिए एंटी वेनम तैयार करने पर जोर दिया गया है।
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