छुट्टियों में क्यों भागते हैं लोग समंदर की ओर, क्या है “ब्लू स्पेस थेरेपी”
कॉरपोरेट जॉब हो या सरकारी, तनावपूर्ण क्षेत्र में काम करने वाले लोग छुट्टी मिलते ही घमने निकल जाते हैं। गोवा, पुरी, दीघा जैसे समुद्रतटों पर भीड़ लग जाती है। लोगों को यहां सुकून का अहसास होता है। इसे ब्लू स्पेस थेरेपी कहा जाता है। यहां ब्लू स्पेस से मतलब पानी से जुड़ी चीजों से है, जैसे- झील, नदी और समंदर।

दरअसल, मेंटल हेल्थ से जुड़े मामले डिजिटल दौर में तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे पहले तो किसी ने डिप्रेशन, अकेलेपन और एंग्जायटी जैसी बीमारियों के नाम सुने भी नहीं थे। लेकिन अब हर कोई इन नामों को जानने के साथ-साथ इनके बुरे अनुभव से भी गुजर रहा है।
कई रिपोर्ट्स में यह बात निकलकर सामने आई है कि ब्लू स्पेस के ज्यादा संपर्क में रहने से मेंटल हेल्थ अच्छी रहती है। रिपोर्ट्स तो यह भी बताती है कि तटीय इलाकों में रहने वाले और वहां जाने वाले लोगों में साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस यानी मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानियां बहुत कम देखी गई।
मरीन बायोलॉजिस्ट वालेस जे. निकोलस की किताब ब्लू माइंड में यह साबित किया गया था कि पानी के आसपास रहने से स्ट्रेस हॉर्मोन कोर्टिसोल कम होता है और व्यक्ति खुद को लेकर पॉजिटिव महसूस करने लगता है।
वैसे तो ब्लू स्पेस थेरेपी पानी के आसपास रहने से दिखने वाले पॉजिटिव बदलावों की बात करती है, पर अब इसके फायदों को देखते हुए पानी के अंदर भी इस थेरेपी को दिया जाने लगा है। विदेशों में डिप्रेशन, ट्रॉमा और नशे की लत जैसी दिक्कतों को दूर करने के लिए स्कूबा और फ्री-डाइविंग, वेटलेसनेस के अनुभव, ब्रीदवर्क के साथ मेडिटेशन जैसी थेरेपी लोगों को दी जा रही हैं। इसमें वेटलेसनेस का एहसास सबसे खास है जो नर्वस और ब्रेन सिस्टम को दोबारा से रेगुलेट करने में मदद करता है।
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