आज के कथा साहित्य की जननी हैं लोककथाएं – गुलबीर सिंह भाटिया
इन्टेक का आयोजन ‘लोक कथा-कथन’
विश्व विरासत दिवस के उपलक्ष में भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटैक) के दुर्ग-भिलाई अध्याय द्वारा आयोजित ‘लोक कथा कथन’ में 10 राज्यों के सम्बंधित लोक भाषा के जानकार साहित्यकारों ने 12 लोक कथाओं सुनाई l इस आयोजन में देश के प्रतिष्ठित कथाकार गुलबीर सिंह भाटिया ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विशेषज्ञ उद्बोधन में लोक कथाओं के साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा, “हम पुरखों के ऋणी हैं जिन्होंने लिपि के अभाव में भी कथा को जीवन दिया और उन कथाओं को जीवित रखा जो हमारे आज के कथा साहित्य की जड़ भी है, मूल भी है ।” उन्होंने मत व्यक्त किया कि लोक कथाएं आज के कथा साहित्य की जननी है। ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ कहानी को वह प्रवेश द्वार बतलाया जिससे होकर हमारी लोक कथा आधुनिक कहानी में प्रवेश करती है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि आज की कहानी लोक कथाओं की नींव पर खड़ी है। इस विरासत को सहेजने की जरूरत है ताकि लोक कथाओं की अनुगूंज आगामी सदियों तक गूंजती रहे।
आरंभ में इंटेक की दुर्ग-भिलाई अध्याय की संयोज़िका डॉ हंसा शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत करते हुए लोक कथाओं को महत्वपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक धरोहर बतलाया l
कार्यक्रम का संचालन करते हुए शिक्षाविद डॉ डी एन शर्मा ने कहा कि हजारों वर्षों पूर्व जन्मी लोक कथाएं हमारी अनमोल अमूर्त धरोहर हैं । उन्होंने दुःख व्यक्त किया कि हमारी पीढ़ी की गलती से नई पीढ़ी मोबाइल के जरिए कार्टून, यू–ट्यूब, सोशल मीडिया में मस्त होकर लोक कथाओं से अनभिज्ञ है।
सुप्रसिद्द वरिष्ठ साहित्यकार परदेसी राम वर्मा ने रंगभेद, जातिवाद, ऊंच–नीच के खिलाफ छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय ‘करिया मुसवा पंडरा मुसवा’ छत्तीसगढ़ी लोककथा रोचक ढंग से बतलाई । प्रतिष्ठित कवियत्री संतोष झांझी ने पंजाब में लोकप्रिय भगवान में विश्वास को स्थापित करती पंजाबी लोक कथा ‘रजनी’ को सुनाया । प्रसिद्ध कवियत्री विद्या गुप्ता ने मध्यप्रदेश के निवाड़ क्षेत्र में प्रचलित निमाड़ी लोककथा ‘राजा भरथरी’ का रोचक कथन किया।
चर्चित कवि शरद कोकास ने महाराष्ट्र प्रांत की मराठी लोककथा ‘बट्टे की खीर’ का एकल अभिनय कर प्रस्तुति की। युवा साहित्यकार जोस एंथोनी ने केरल की एक मलयालम लोक कथा ‘गोरा खरगोश’ को सुनाया। कहानीकार शिवनाथ शुक्ला ने उत्तर प्रदेश में कही जाने वाली लोककथा ‘सुख की मुरली दुख की मुरली‘ को प्रभावी ढंग से सुनाया। हिंदी व बंगाली भाषा के साहित्यकार गोविंद पाल ने बंगाल की दो भाइयों के संपत्ति बंटवारे से संबंधित बंगाली लोककथा को सुनाई ।
देवरी (डौंडीलोहारा) से आए केशव शर्मा ने राजस्थान में लोकनायक तेजा पर केंद्रित लोककथा ‘वचन के पक्के‘ कही। उड़िया–भाषी रविंद्र साहू ने ‘ठगराज’ नामक उड़िसा की लोककथा सुनाई। तेलगुभाषी सुश्री डी नागमणि ने आंध्रप्रदेश में प्रचलित भगवान वेंकेटश्वर से जुड़ी लोककथा ‘गोविंदा गोविंदा’ को सुनाया। सांस्कृतिकर्मी डॉ डीपी देशमुख ने छत्तीसगढ़ की रोचक लोककथा ‘ मारे मुसुवईन ला’ का कथन किया । प्रीति अजय बेहरा ने उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ से जुड़ी उड़िया ‘अगहन वृहस्पति’ लोककथा को बतलाया ।
कार्यक्रम में प्रदीप भट्टाचार्य, डॉ पी सी पंडा, महेश चतुर्वेदी, , राजेन्द्र राव, बी पोलम्मा, सहदेव देशमुख, शानू मोहनन, रविंद्र खंडेलवाल, कांतिभाई सोलंकी, विश्वास तिवारी, जगमोहन सिन्हा, सरस्वती विशेष रूप से उपस्थित रहे ।
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