बस्तर में 11वीं सदी की स्थापत्य कला को संजोए खड़ा है प्राचीन शिव मंदिर
जगदलपुर। बस्तर रियासत की पुरानी राजधानी स्थित प्राचीन शिव मंदिर के प्रांगण में ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का भव्य आयोजन किया गया। सोमनाथ मंदिर के उस अदम्य स्वाभिमान की गाथा भी गूंजी, जो सदियों के संघर्ष के बाद आज अपने पूर्ण वैभव के साथ खड़ा है। लगभग एक हजार वर्ष पूर्व सोमनाथ मंदिर को जिस तरह नष्ट कर लूटपाट की गई थी, वह भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय था। उसके बाद भी कई बार आक्रमण हुए लेकिन हर बार महादेव के प्रति अटूट आस्था ने इसे वापस खड़ा कर दिया। (image credit puratattva.in)

बस्तर का यह मंदिर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि के साथ ही अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्य और भव्य स्थापत्य समेटे हुए है। ग्राम बस्तर में स्थित प्राचीन शिव मंदिर का निर्माण भी करीब एक हजार साल पहले छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा कराया गया था।

11वीं शताब्दी की स्थापत्य कला को संजोए यह शिवालय बस्तर संभाग के दूसरे सबसे बड़े तालाब बाणसागर के किनारे अपनी पूरी भव्यता के साथ अडिग खड़ा है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 पर स्थित यह ग्राम रियासत काल में काकतीय राजाओं की राजधानी हुआ करता था, जिसका गौरवशाली इतिहास लगभग ढाई सौ वर्षों तक इस मिट्टी से जुड़ा रहा।
अपनी बेजोड़ निर्माण शैली और पुरातात्विक महत्व के कारण आज यह मंदिर केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई सूक्ष्म और कलात्मक मूर्तियां प्राचीन भारतीय शिल्प कौशल की कहानी कहती हैं, हालांकि समय-समय पर मूर्ति तस्करों की गतिविधियों ने इस धरोहर की कुछ प्राचीन प्रतिमाओं को काफी नुकसान पहुँचाया है। इस मंदिर की एक खास पहचान इसके मुख्य द्वार के ठीक ऊपर पत्थर पर उकेरी गई मयूर की आकृति है। यही आकृति कभी अविभाजित मध्यप्रदेश के पाठ्य पुस्तक निगम का आधिकारिक प्रतीक चिह्न हुआ करती थी। वर्तमान में पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ की गई आकर्षक बागवानी ने मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा दिए हैं, जिससे यह न केवल श्रद्धालुओं बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है। आस्था के केंद्र के रूप में इस शिवालय की महत्ता आज भी वैसी ही बनी हुई है।
महाशिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा और मकर संक्रांति जैसे विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। बस्तर के इस शिव मंदिर के समकालीन ही नारायणपाल, छिंदगांव, समलूर, भैरमगढ़, गढ़ धनोरा और बारसूर में भी प्राचीन मंदिर स्थित हैं, जिनका निर्माण छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा ही किया गया था। इन सभी ऐतिहासिक स्थलों पर आज भी प्रतिवर्ष भव्य मेलों का आयोजन होता है, जो बस्तर की समृद्ध परंपरा और संस्कृति को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।
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