बाल सुधार गृह बच्चों को अपराध से दूर करने में नाकाम सिद्ध हुए हैं. तमाम काउंसलिंग और अन्य कोशिशें भी बेअसर साबित हुई हैं. बाल सुधार गृह बच्चों का न तो नशा छुड़ा पा रहे हैं और न ही उनमें कानून का खौफ जगा पा रहे हैं. बाल सुधार गृह ही क्यों, केन्द्रीय कारागार भी अपराधियों में कानून का भय पैदा करने में नाकाम सिद्ध हुए हैं. उलटे ये संस्थान अपराध का प्रशिक्षण केन्द्र बन गए हैं. जब बालक या अपराधी इन संस्थानों से निकलता है तो वह पहले से ज्यादा निडर, पहले से ज्यादा खूंखार और संगठित होता है. सभ्य समाज बालिग और नाबालिग को परिभाषा में बांधता है.












