माना जाता है कि शिल्पकारी शौक के साथ ही आजीविका का भी साधन हो सकती है. इसलिए देश के तमाम महाविद्यालयों में शिल्पकला का प्रशिक्षण दिया जाता है. हिन्दी फिल्मों में भी हम देखते रहे हैं कि गरीब विधवाएं अपने बच्चों को सिलाई कढ़ाई करके पढ़ा लिखा रही हैं. बच्चे बड़े होकर पुलिस अफसर, वकील बैरिस्टर बन रहे हैं. पर टेक्नोलॉजी के दौर में शिल्पकारी केवल एक मिथक बनकर रह गई है. अब शिल्पकारी एक उम्दा शौक तो हो सकती है पर यह अच्छी आजीविका नहीं दे सकती. प्रसिद्ध घुरा शिल्पकार रुख्मणी चतुर्वेदी की हालत ने इस विषय को दोबारा सामने ला दिया है.












