जनकसुता जानकी का इसलिए नाम पड़ गया सीता, यहां है वह स्थान
पुनौरा गांव में एक स्थल है जहां माता सिता का मंदिर बना हुआ है। कभी यह गांव बिहार के सीतामढ़ी जिले में हुआ करता था। अब यह नेपाल का हिस्सा है। राजा जनक यहीं अपने खेत में हल चलाने के लिए गए थे। हल चलाते समय उसकी फाल एक धातु के कलश से टकराई। इसी कलश से माता सीता प्रकट हुई थीं। हल के नुकीले भाग को सीत कहते हैं और इससे खेत में बनी गहरी नाली को सीता कहा जाता है। इसलिए बालिका का नाम सीता रखा गया।

माता सीता वैशाख शुक्ल नवमी तिथि पर प्राकट हुई थीं। सीता जी का जनकपुर धाम में ही लालन-पालन हुआ था, जो कि आज नेपाल में स्थित है। अपने विवाह से पहले देवी सीता ने जनक के महल में अपना बचपन गुजारा था। इस स्थान पर जानकी जी का मंदिर भी मौजूद है। रावण ने छल से नासिक जिले के पंचवटी से सीता मां का हरण किया था और उन्हें अपने साथ लंका ले गया।
धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, बिहार के सीतामढ़ी में स्थित पुनौरा गांव माता सीता का जन्म स्थल है। यहां माता के प्राकट्य के दृश्य के दर्शन करने साधक दूर-दूर से आते हैं। मान्यता है कि यह जिला उस समय में राजा जनक की राजधानी मिथिला में आता था।
धनुषा धाम में गिरा धनुष का एक टुकड़ा
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, धनुषा धाम का संबंध भी त्रेता युग से माना जाता है। मान्यता है कि जब प्रभु राम ने शिव धनुष को तोड़ा तो उसका एक टुकड़ा आकाश, दूसरा पालात और तीसरा धरा पर जाकर गिरा था। जहां वह टुकड़ा गिरा वह धनुषा धाम है। यह स्थान भी आज नेपाल में स्थित है।
विवाह के पश्चात इस महल में प्रभु राम के साथ रहीं देवी सीता
मान्यता है कि प्रभु राम से विवाह होने के पश्चात देवी सीता अयोध्या में स्थित कनक भवन में रही थीं। इस महल में महारानी कौशल्या ने सीता माता को मुंह दिखाई भेंट की थी। इस मंदिर में श्रीराम के अलावा किसी भी अन्य पुरुष देवता की मूर्ति मौजूद नहीं है क्योंकि, इस स्थान को माता सीता का अंत:पुर माना जाता है। केवल हनुमान जी को भवन के आंगन में स्थान दिया गया है।
इस स्थान पर रावण ने छल से किया था सीता हरण
मान्यताओं के अनुसार, जिस स्थान से लंकापति रावण ने माता सीता का हरण छल से किया था वह महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित है। नासिक में पंचवटी स्थान पर 5 वट वृक्ष एक साथ मौजूद हैं। यही कारण है कि इस जगह को पंचवटी के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा, अयोध्या में सीता रसोई स्थित है, जो कि एक मंदिर है। माना जाता है कि उस काल में शगुन के तौर पर राज परिवार की बहू अपने परिवार के लिए एक बार कुछ न कुछ भोजन जरूर पकाती थी।
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