बच्चा नहीं हुआ तो मेघालय की खासी महिलाएं दे देती हैं पति को तलाक

बच्चा नहीं हुआ तो मेघालय की खासी महिलाएं दे देती हैं पति को तलाक

मेघालय। गारो और खासी समुदाय में शादी के बाद दूल्हा विदा होकर दुल्हन के घर जाता है। वंश, कुल की पहचान और विरासत मां के ज़रिए तय होती है। सबसे छोटी बेटी पारंपरिक तौर पर परिवार की पुश्तैनी प्रॉपर्टी की कस्टोडियन बन जाती है। खासी भारत के सबसे जाने-माने मातृवंशीय समुदायों में से हैं, और उनकी शादी की परंपराएं दिलचस्प होती हैं।

खासी शादी न तो कोई वादा है और न ही कोई ऐसा समझौता या कॉन्ट्रैक्ट जो जोड़े को कानून से बांधता हो, बल्कि यह परिवार बनाने के लिए एक पुरुष और महिला के बीच आपसी सहमति है। जब रिश्तो को टिकाना गैरजरूरी हो जाता है तो खासी महिला जमीन पर कौड़ी फेंक कर अपनी नाराजगी जाहिर करती है। इसके बाद शादी समाप्त मानी जाती है।

बच्चा नहीं हुआ तो मेघालय की खासी महिलाएं दे देती हैं पति को तलाक

पुरुष को उसकी पत्नी के कुल द्वारा ‘उ खुन की ब्रिव’ (दूसरे लोगों का बेटा) माना जाता है। शादी के बाद भी पुरुष अपने खुद के कुल का स्वतंत्र और पूर्ण सदस्य बना रहता है। पति अगर अपनी पत्नी के कुल की उम्मीदों के मुताबिक ठीक से व्यवहार नहीं कर पाता, तो उसे वहां से जाना पड़ता है और सम्मान के साथ अपने कुल में लौटना पड़ता है।

खासी सोच में शादी का मकसद बच्चे पैदा करना है, इसलिए अगर पति-पत्नी के बच्चे नहीं होते, तो पुरुष का कुल कभी-कभी उसे वापस बुला सकता है क्योंकि उनका मानना ​​है कि यह शादी भगवान की मर्जी से नहीं हुई है। खासी पारंपरिक शादी पति और पत्नी को एक शरीर और एक खून में नहीं जोड़ती है। खासी लोगों में इसे ‘का सांग’ (पवित्रता का उल्लंघन) कहा जाता है।

खासी शादी का मूल सिद्धांत यह है कि पिता ही ‘उ सिम्बई उ रनाई’ (बीज) देता है, जबकि मां ही बच्चे को जीवन, खून और पोषण देती है। बच्चा बीज देने वाले का नहीं, बल्कि उस कोख का होता है जो जीवन, खून और पोषण देती है। खासी सोच में, पिता का बच्चों के साथ कोई खून का रिश्ता नहीं होता।

चूंकि महिला को एक ऐसा पुरुष मिलता है जो उसके घर आकर रहता है, इसलिए खासी शादी की रस्म हमेशा दुल्हन के घर पर ही होती है, न कि किसी चर्च या मंदिर में। दुल्हन अपने घर पर दूल्हे के आने का इंतजार करती है। दूल्हे के साथ केवल उसके परिवार के पुरुष सदस्य और दोस्त आते हैं।

विवेकानंद केंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ कल्चर के खासी शादी सिस्टम के बारे में दिए गए ब्यौरे के अनुसार, खासियों में शादी पारंपरिक तौर पर दो अलग-अलग कुलों के बीच का रिश्ता है। एक ही खानदान में शादी करना मना है क्योंकि सदस्यों को एक ही पुरखे की मां का वंशज माना जाता है। शादी में पारंपरिक रूप से दोनों पक्षों के प्रतिनिधि, खासकर मामा शामिल होते हैं। दूल्हा और उसके रिश्तेदार दुल्हन के घर जाते हैं, जहां शादी की घोषणा से पहले दोनों पक्ष औपचारिक बातचीत करते हैं।

खासी शादी की सबसे खास बात यह है कि पति का अपनी पत्नी के साथ अपनी सास के घर में रहना आम बात है। दुल्हन के दूल्हे के घर में घुलने-मिलने के बजाय, पति पारंपरिक रूप से पत्नी के परिवार के घर का हिस्सा बन जाता है। खासी जनजाति के सदस्य नार्तियांग लेई शिलांग के हवाले ने इस व्यवस्था को समझाया। वह कहते हैं कि भारत के दूसरे हिस्सों के विपरीत, यह हमारी महिला है, न कि हमारा पुरुष, जो आने वाली पीढ़ियों को परिवार का नाम सौंपता है। औरत को अपने माता-पिता की विरासत और कबीले की विरासत मिलती है और वह उसकी कस्टडी लेती है। अगर वह सबसे छोटी बेटी है, तो उसका पति उसके घर आकर रहता है।

#Khasi_Marriage #Matriarchy #Khasi_Divorce

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *