देसी गाय के गोबर से बनाए दीये, दोहरी उपयोगिता ने किया मालामाल
सीतामढ़ी। रमाशंकर कुमार ने गोबर से विभिन्न चीजों को बनाकर और उसकी बिक्री कर लाखों रूपये कमाकर यह साबित कर दिया है कि किसी भी क्षेत्र में से सकारात्मक सोच हो, उसका परिणाम अच्छा होता है। दीपावली में दीयों की रोशनी से घर-आंगन सजाने की परंपरा रही है। प्रदूषण मुक्त दीपक जले और बाद में जल कर बने राख का भी उपयोग हो। उसके लिए हुनरमंद रमाशंकर कुमार गोबर का दीपक बना रहे है। मांग इतनी ज्यादा है कि उसे पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
NBT में प्रकाशित खबर के अनुसार सीतामढ़ी के लक्ष्मीपुर गांव के रमाशंकर गोबर से दीये के अलावा ओम, श्री, स्वस्तिक, शुभ-लाभ और ‘हरे कृष्णा’ लिखे सजावटी तोरण द्वार भी तैयार करते है। खास बात यह कि वे देसी गाय के गोबर से तरह-तरह के दीये बनाते हैं।
रमाशंकर कहते हैं कि सनातन धर्म में गोबर को शुभ माना जाता है। पूजा-पाठ के लिए देसी गाय का गोबर आसानी से नहीं मिलता है। ऐसे में गोबर से बने सजावटी उत्पाद लोगों को अपनी सनातन परंपराओं से जुड़े रहने का एक बेहतर विकल्प मिल गया है। इन दीयों का उपयोग हो जाने के बाद इन्हें खाद के रूप में काम में लाया जा सकता है।
युवा उद्यमी रमाशंकर कहते है कि गोबर के दीयों को मजबूत बनाने के लिए एक खास तरह के पाउडर का उपयोग किया जाता है। खराब होने तक इसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इस्तेमाल के बाद मिट्टी में मिलकर खाद बन जाता है, जिस खाद गमले/खेत में उपयोग किया जा सकता है।
रमाशंकर ने पिछले साल तीस हजार दीये सेल किये। उन्होंने सुगंधित मोमबती का कारोबार भी शुरू किया, लेकिन अब प्रशिक्षण के बाद दीये बेच रहे हैं। वे कहते है कि गोबर को सुखाने में मेहनत और दीयों को मजबूती देने वाले पावडर की कीमत का आंकलन कर दीपक व अन्य सामग्री की कीमत तय होती है। वे अधिकतर थोक में सामग्रियों की बिक्री करते है। कम मात्रा में लेने पर एक दीया पांच रुपये का है, जबकि एक हजार से पांच हजार पीस यानी बड़े ऑर्डर पर कीमत तीन रुपये प्रति पीस होती है। गत वर्ष करीब 30 हजार दीये बिके थे। इस बार मांग अधिक है। मौसम अनुकूल नहीं होने के कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
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