भिलाई। वैसे तो सभी नृत्य तन एवं मन को एक सूत्र में पिरोकर साध देते हैं किन्तु कथक का लचीलापन, कथा कहने की उसकी शैली आत्मा को तृप्त कर देती है। यही वजह है कि कथक का उल्लेख महाभारत काल में भी मिलता है। कथक समय के साथ अपने स्वरूप को बदलता गया है। भावातिरेक की अपनी विशिष्टता के कारण यह मंदिर से लेकर दरबार तक, हिन्दी फिल्मों से लेकर स्कूल के मंच तक हर जगह अपनी अमिट छाप छोड़ने में सफल रहा है। यह कहना है कथक गुरू डॉ सरिता श्रीवास्तव का।












