Tribal Displaced

Tribals must suffer the pangs of development

भारत ही क्यों, किसी भी देश में एक दूसरे के धुर विरोधी दो वर्ग हमेशा रहे हैं. एक वह जिसके पास सबकुछ है और दूसरा वह जिसके पास अपने जीवन के अलावा कुछ भी नहीं है. समाजवाद इन सभी को समान अधिकार देने की बातें करता है जबकि अधिनायकवाद का मानना रहा है कि कुछ लोग हमेशा से नेतृत्व के लिए ही पैदा होते रहे हैं. नेतृत्व करना उनका स्वाभाविक अधिकार है. एक ऐसे ही समर्थ वर्ग के धर्मगुरू ने एक बार भिलाई की अपनी सभा में कहा था कि आदिवासियों को या तो मरना होगा या फिर अपनी जमीन छोड़कर जाना होगा.

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