सरगुजा की रामगढ़ पहाड़ी पर स्थित है एशिया की प्राचीनतम नाट्यशाला

सरगुजा की रामगढ़ पहाड़ी पर स्थित है एशिया की प्राचीनतम नाट्यशाला

डॉ देवेन्द्र नाथ शर्मा । छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर से 60 किलोमीटर दूर स्थित है रामगढ़ पहाड़ी l रामगढ़ पहाड़ी पर दो गुफाएं हैं; एक सीताबेंगरा और दूसरी जोगीमारा l रामगढ़ की पहाड़ी को ‘रामगिरी’ भी कहा जाता है क्योंकि यह लोक मान्यता है कि भगवान राम ने बनवास के दौरान इस पहाड़ी पर कुछ समय बिताया थाl उत्तरी गुफा को सीताबेंगरा अर्थात सीता का कमरा माना जाता है l

सरगुजा की रामगढ़ पहाड़ी पर स्थित है एशिया की प्राचीनतम नाट्यशाला

तीसरी-दूसरी शताब्दी (ईसा पूर्व) काल की मानी जाने वाली सीताबेंगरा वास्तव में नाटक, गीत और काव्य पाठ के प्रदर्शन के लिए बनी जगह थी l सामने मंच और पीछे दर्शकों के बैठने की व्यवस्था की इसकी बनावट यूनानी रंगमंच जैसी है l पास में स्थित जोगीमारा गुफा उन कलाकारों का विश्राम स्थल रही होगी, जो सीताबेंगरा में प्रदर्शन करते थे l (पुरातत्ववेत्ता डॉ थियोडोर ब्लोज, 1904) l

प्राचीन भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्द जोगीमारा गुफा में ब्राह्मी लिपि में लिखे गए अभिलेख में प्रेम, भक्ति और कला की झलक मिलती है l यह भारत के अब तक ज्ञात सबसे पुराने भित्तिचित्र माने जाते हैं; हालाकि यह चित्र समय और नमी से ख़राब हो चुके हैं पर अभी भी इनमें पेड़, हाथी, रथ और नृत्य करती हुई नारियां को चित्रों में पहचाना जा सकता हैं l चित्रों में लाल, पीले और दूसरे रंगों का प्रयोग हुआ है जो मौर्य कालीन कला की परंपरा का संकेत देते हैं ।

इन चित्रों की प्रतिलिपियां तैयार करने वाले अध्येता असित कुमार हलधर (1914) के निष्कर्ष के अनुसार यह भित्तिचित्र दो अलग-अलग कालखंडों के हैं, पहले तीसरी-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का अत्यंत परिष्कृत चित्रण कार्य और दूसरा, कई शताब्दियों के बाद का अपेक्षाकृत साधारण चित्रण l हलधर के अनुसार जोगीमारा की दीवारों पर ‘सुतनुका का नृत्यगृह’ शब्द का उल्लेख है l शिलालेख में उल्लेख है कि सुतनुका नामक देवदासी ने इस स्थल को नारियों के विश्राम स्थल के रूप में बनवाया था l इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि जोगीमारा गुफा सीताबेंगरा में नृत्य प्रदर्शन करने वाली स्त्रियों का विश्राम स्थल रही होगी l
1848 में लेफ्टिनेंट कर्नल जे आर ओसले ने रामगढ़ गुफाओं का पहला उल्लेख करते हुए पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर और एक बड़ी सुरंग का वर्णन किया l लेफ्टिनेंट-कर्नल टी डाल्टन 1863-64 में और उसके बाद वी वॉल ने 1872 में रामगढ़ की पहाड़ियों का सर्वेक्षण किया l 1874-75 में जेड वैगलर ने इन्हें रामायण के चित्रकूट से जोड़ा l अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1871 में शिलालेख प्रकाशित कर बताया कि एक मूर्तिकार देवदीना ने किसी देवदर्शिन व्यक्ति नामक व्यक्ति के लिए यह लेख उकेरे हैं l दिसंबर 1964 में भारत सरकार ने इन गुफाओं को राष्ट्रीय महत्व का मानते हुए इन्हें संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया था।
रामगढ़ की पहाड़ी को यहां का आदिवासी समुदाय इस ‘देव पहाड़’ कहते हैं l यह स्थानीय जनजाति समाज की आस्था का प्रतीक भी है l उनके लिए यह कोई पत्थर नहीं बल्कि एक जीवित देवता है l पहाड़ी पर एक राम जानकी मंदिर भी है l यह बहु-प्रचलित मान्यता है कि राजा भोज की उज्जयनी को छोड़ कर महाकवि कालिदास ने यहाँ आकर इसी रामगढ़ की पहाड़ी को अपना आश्रय बनाया था और यहीं पर उन्होंने अपने महाकाव्य ‘मेघदूतम’ की रचना की थी l आषाढ़ के पहले दिन यहां बादलों की पूजा अर्चना की जाती है l हर साल इस दिन आसपास के गांवों के आदिवासी यहां पूजा करने आते हैं l राज्य सरकार ने महाकवि कालिदास की प्रतिमा भी यहाँ स्थापित की है, जिसमे महाकवि कालिदास अपने हाथ में ‘मेघदूतम’ लिए हुए हैं l

(लेखक सेवानिवृत प्रोफेसर और इंटैक के आजीवन सदस्य हैं)

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