सुकमा में अब भी खुले आसमान के नीचे पड़ा 100 करोड़ का धान
सुकमा। बस्तर संभाग में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए हजारों टन धान का अब तक उठाव नहीं हो पाया है। 25 जून 2026 की स्थिति में दंतेवाड़ा को छोड़कर छह जिलों के उपार्जन केंद्रों में 34,231.28 मीट्रिक टन धान शेष है। यदि समय रहते इसे सुरक्षित भंडारण तक नहीं पहुंचाया गया, तो मानसून की बारिश से 100 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के धान को नुकसान पहुंचने की आशंका है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उपार्जन केंद्रों में शेष धान की कीमत समर्थन मूल्य के आधार पर 100 करोड़ रुपये से अधिक है। लंबे समय तक खुले या अस्थायी भंडारण में धान पड़े रहने से नमी बढ़ने, गुणवत्ता प्रभावित होने, वजन कम होने और फसल खराब होने का खतरा बना हुआ है।
धान के सुरक्षित भंडारण, रखरखाव और निगरानी में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है। वहीं लेखा परीक्षण के दौरान धान में कमी पाए जाने पर उसकी भरपाई भी समितियों से कराई जाती है, जिससे उन पर दोहरी आर्थिक मार पड़ने की आशंका है।
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अनुसार 25 जून तक बस्तर संभाग के छह जिलों में धान का उठाव पूरा नहीं हो पाया है। पूरे संभाग में करीब 4200 करोड़ रुपये का धान खरीदा गया था, जिसमें से अभी भी 100 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का धान उपार्जन केंद्रों में रखा हुआ है।
धान उठाव के मामले में दंतेवाड़ा सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला जिला रहा, जहां शेष धान की मात्रा शून्य है। वहीं प्रतिशत के हिसाब से सुकमा सबसे पीछे है, जहां अभी भी करीब 3.35 प्रतिशत धान उपार्जन केंद्रों में पड़ा हुआ है। मात्रा के आधार पर सबसे अधिक 14,774.24 मीट्रिक टन धान कांकेर जिले में शेष है।
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष दिनेश कश्यप ने मुख्यमंत्री और सहकारिता मंत्री से मांग की है कि 31 मार्च 2026 के बाद शेष धान के कारण सहकारी समितियों को होने वाली आर्थिक हानि की भरपाई शासन स्तर पर की जाए, ताकि समितियों की वित्तीय स्थिति प्रभावित न हो और किसानों को मिलने वाली सेवाएं सुचारु रूप से जारी रह सकें।
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