मल्चर से किए पराली के टुकड़े, तोता हल से मिट्टी में मिला दिया
रायपुर। खेतों में फसल कटाई के बाद बचने वाले अवशेषों को जलाने की परंपरा अब धीरे-धीरे बदल रही है। वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के जरिए इन्हें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और खेती की लागत घटाने का प्रभावी साधन बनाया जा रहा है। इसी दिशा में कृषि विज्ञान केंद्र रायगढ़ ने निकरा परियोजना के तहत अंगीकृत ग्राम नावापारा में मल्चर एवं तोता हल आधारित फसल अवशेषों के इन-सीटू प्रबंधन का सफल प्रदर्शन किया।

कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.एस. राजपूत के मार्गदर्शन में प्रगतिशील किसान होमेश्वर पटेल, तेजराम पटेल और रूपचंद पटेल के खेतों में आयोजित प्रदर्शन में किसानों को आधुनिक तकनीक की उपयोगिता से अवगत कराया गया। मक्का कटाई के बाद खेत में बचे डंठलों और अवशेषों को ट्रैक्टर चालित मल्चर से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में फैलाया गया। इसके बाद तोता हल से जुताई कर इन्हें मिट्टी में मिला दिया गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि फसल अवशेष मिट्टी में मिलकर धीरे-धीरे जैविक पदार्थ में बदल जाते हैं, जिससे जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता, संरचना और पोषक तत्वों को सुरक्षित रखने की क्षमता में सुधार होता है। अवशेषों में मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्व पुनः मिट्टी में लौट आते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और खेती की लागत घटती है।
वैज्ञानिक (उद्यानिकी) डॉ. के.एल. पटेल और वरिष्ठ अनुसंधान सहायक मनोज कुमार साहू ने किसानों को तकनीक के व्यावहारिक लाभों की जानकारी दी। किसानों ने इसे कम लागत वाली, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ खेती के लिए उपयोगी तकनीक बताते हुए इसे अपनाने में रुचि दिखाई। विशेषज्ञों का मानना है कि फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन से मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा, उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय में भी सकारात्मक वृद्धि होगी।
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