बिहार के इस मंदिर में होती है बकरे की रक्तहीन बलि, जीवित लौटता है घर
कैमूर। मुंडेश्वरी माता मंदिर में जिनकी मन्नतें पूरी होती हैं वो बकरा लेकर आते हैं। श्रद्धालु साथ लाए बकरे को बलि के लिए पंडित को देते हैं। पंडित बकरे को माता के सामने रख देता है। कुछ मंत्र बुदबुदाता है, जयकारा लगाता है।श्रद्धालुओं भी जयकारा लगाते हैं। कुछ सेकेंडों में बकरा बेहोश हो जाता है। फिर पंडित जयकारा लगाते हैं, मूर्ति को छूकर एक हार लेते हैं, मंत्र पढ़ते हैं और बकरे पर फेंक देते हैं। बकरा उठ जाता है। हो गई बलि।

ये अनोखी बलि है बिहार के भभुआ के मुंडेश्वरी माता मंदिर की। ये पटना से 200 किमी दूर सासाराम के बाद आता है। कैमूर जिले के भभुआ मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर भगवानपुर ब्लॉक स्थित रामपुर पंचायत में पंवरा पहाड़ी पर है। ये पहाड़ी 600 फीट की ऊंचाई पर है। नीचे से मंदिर जाने के दो रास्ते हैं। पहला सीढ़ियों से, दूसरा घुमावदार सड़क, जो 524 फीट की उंचाई तक जाती है। इन दोनों ही रास्तों के बाद फिर सीढ़ियों पर चढ़ मंदिर तक जाया जाता है।
इसे 5वीं शताब्दी के आसपास का माना जाता है। 6ठी शताब्दी के दौरान इसे पहली बार एक चरवाहे ने देखा था। ये मंदिर अपने इतिहास के साथ ही यहां होने वाली रक्तहीन बलि के लिए भी जाना जाता है। यहां बकरे की जान नहीं ली जाती। बस मंत्रों से कुछ देर के लिए बेहोश कर दिया जाता है। इसे ही बलि माना जाता है।
मंदिर आने वाले श्रद्धालु मन्नत रखते हैं। जब उनकी मुराद पूरी हो जाती है तो बकरे की बलि देने आते हैं। मंदिर के पुजारी पिंटू तिवारी के अनुसार, सबसे पहले हवन कुंड पर मन्नत पूरी होने वाले श्रद्धालु का संकल्प कराया जाता है। वहां पर परिवार के लोगों के साथ ही बकरा भी होता है।
इसके बाद वो बकरे को मंदिर के गर्भगृह में ले जाते हैं। गर्भगृह में मां मुंडेश्वरी की प्रतिमा के चरणों के नीचे ही बकरे को लिटा देते हैं। मंत्र पढ़े जाते हैं, इसके बाद बकरा बेहोश हो जाता है। मां की पूजा के बाद वो बकरा खुद खड़ा हो जाता है। यही उसकी बलि होती है। कई भक्त ऐसे होते हैं जो बलि देने के बाद बकरे को छोड़ देते हैं। जबकि, कुछ घर ले जाकर उसकी बलि देते हैं फिर प्रसाद के रूप में उसे खाते हैं। यह बलि प्रथा कब से शुरू हुई, इसकी कोई जानकारी यहां किसी को नहीं है।
पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर का इतिहास ऐसा है कि इसके बारे में कोई सही सही जानकारी नहीं दे पाएगा। अभी सिर्फ पहाड़ी पर मंदिर का गर्भगृह है। जबकि पहले कभी यहां चारों तरफ मंदिर बने थे। बड़ा स्ट्रक्चर था। इसे मुगल शासकों ने तोड़ा था। इसके अवशेष आज भी यहीं पड़े हैं।
मान्यता के अनुसार, यहां चंड और मुंड नाम के दो असुर रहा करते थे। ये लोगों को प्रताड़ित करते थे, जिनकी पुकार सुन मां धरती पर आया और दोनों असुरों का वध किया। माता ने सबसे पहले चंड का वध किया। यह देख मुंड मां से युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी पर छिप गया। पर देवी मां ने इस पहाड़ी पर पहुंच कर मुंड का भी वध किया। इसी के बाद से यह जगह माता मुंडेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
मां मुंडेश्वरी मंदिर न्यास समिति के कोषाध्यक्ष गोपाल कृष्ण बताते हैं कि 635 ईसा पूर्व जब इलाके के चरवाहे पहाड़ियों पर आते थे, उसी दरम्यान यह मंदिर देखा गया। मंदिर को जिस डिजाइन में बनाया गया, वो नागा शैली में है। ये शैली सदियों पुरानी है। उस वक्त किसका शासनकाल था, इस बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं।
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