दुनिया में कई तरह के लोग होते हैं। उनमें एक प्रजाति ऐसी होती है जिसे दूसरे का काम खराब और अपना वही काम अच्छा लगता है। हम सभी में इस प्रजाति का थोड़ा-बहुत अंश होता ही है। किसी-किसी में अनुपात बिगड़ जाने से ज्यादा होता है। हमारे अतुल्य भारत में जहां परिधान और वेशभूषा आपका स्टेटस सिंबल बनते हैं, उपभोक्तावाद की संस्कृति ही लाखों लोगों का पेट पाल रही है, वहां कपड़े का साइज़ ही नहीं वरन कपड़े की प्रजाति भी आपका चारित्रिक विश्लेषण करते हैं।












