देश में लोकतंत्र की भद्द पिटी है तो उसके लिए जितने जिम्मेदार नेता हैं, उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदार हम आम नागरिक हैं. नेता अपनी सुविधा के लिए जनता को भीड़ में तब्दील करने की कोशिश करते हैं औऱ हम उसमें शामिल हो जाते हैं. घर में खाने को कितना भी हो, मुफ्त भोजन का लालच हमें ट्रकों में बैठकर मीलों का सफर तय करने को मजबूर कर देता है. मुफ्त की दारू से चुनाव जीतना तो जैसे देश में परिपाटी ही हो गई है. संचार क्रांति के इस युग में ऐसे कितने नेता रह गए हैं जिन्हें लाइव सुनने के लिए लोग मरे जा रहे हों. फिर भी, प्रत्येक नेता की रैली में हजारों की भीड़ जुटाई जाती है. यातायात नियमों को धता बताकर ट्रकों, ट्रेलरों और डम्परों में लोगों को ढोया जाता है.












