बरसों बाद आज फिर पेट के बल लेटकर किताब पढ़ने का सौभाग्य मिला है. यह मेरी बचपन की आदत है. गर्मियों की छुट्टी में इसी तरह पेट के बल लेटकर न जाने कितनी किताबें पढ़ चुका हूँ. अंग्रेजी, हिन्दी, बांग्ला की सैकड़ों किताबें इसी तरह उदरस्थ करता रहा हूँ. जब “छोटा ख्याल” हाथ में आया तो पहले तो यूं ही बैठे-बैठे उसे पढ़ना शुरू किया. अभी 10-12 पन्ने ही पढ़े होंगे की अधलेटा हो गया और कुछ और पन्नों के बाद पेट के बल लेट गया. 121 पृष्ठों की किताब पूरी करने के बाद आंखें बंद कर लीं और एक अल्हड़ नदी के पहाड़ों से निकलकर अठखेलियां करते समतल में बहने तक की यात्रा का रसास्वादन करने लगा.












