बातें हैं बातों का क्या…! किसी की अच्छी बात गंदी लगती है तो किसी-किसी की गंदी बात भी अच्छी लगने लगती है. गंदी बात कभी-कभी मजे की बात भी बन जाती है. कभी सच्ची बात चुभती है तो कभी झूठी बात भी भाने लगती है. यह सब स्थान-काल-परिस्थिति और व्यक्तिविशेष पर निर्भर करता है. बातें किसकी अच्छी लगेंगी और किसकी बुरी, यह मनुष्य का पूर्वाग्रह तय करता है. जिस बात को लेकर मां पर झल्लाया जा सकता है, वही बात प्रेमिका कहे तो आदमी बिछ जाता है. पर बात यहां गुरू-चेले की हो रही है.












