राजनीतिक दलों में पार्टी का झंडा-डंडा उठाने वाले सिर्फ और सिर्फ कार्यकर्ता होते हैं. कार्यकर्ता कभी नेता नहीं होता. नेतृत्व के गुण स्वाभाविक होते हैं जिन्हें लोग लेकर पैदा होते हैं. कुछ लोगों को जबरदस्ती नेतृत्व सौंप दिया जाता है पर विपरीत परिस्थितियों में वो ‘हुआ-हुआ’ करने लगते हैं और भेड़िये की खाल अपने आप उतर जाती है.












