भारतीय खानपान सबसे निराला है. आयुर्वेद की इस धरती में भोजन को लेकर जितना संशय हमारे यहां है, अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता. बंगाली हो या बिहारी, पंजाबी हो या ओड़िया, यहां तक कि दक्षिण भारतीय थाली में भी अब दो-चार रोटियां और थोड़ा सा चावल देखने को मिल जाता है. बल्कि अब थाली की यही परिभाषा हो गई है. कोई कहता है कि सिर्फ चावल खाने से पेट नहीं भरता तो कोई कहता है कि रोटी के साथ थोड़ा सा चावल हो तो बात बन जाती है. कोई दिक्कत भी नहीं है. भोजन स्वरूचि का ही करना चाहिए. पर क्या यह सही भी है?












