प्रकृति कार्यशाला : पेट के कीड़े मारने बाघ भी खाता है घास : डॉ दक्षिणकर

Why tigers eat grass, why dogs shed their coatभिलाई। पेट के कीड़े मारने के लिए बाघ भी एक खास किस्म का घास खाता है। गर्मी से बचने के लिए ही रोएंदार पशुओं के बाल झड़ते हैं। प्रकृति के पास हर मर्ज की दवा है। जरूरत है केवल इन्हें ध्यान से देखने और अनुभव करने की। प्रकृति का अध्ययन कर हम अनेक रहस्यों से पर्दा उठा सकते हैं। बच्चों में इन गुणों का विकास करना अत्यंत आवश्यक है। उक्त उद्गार दाऊ वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर नारायण पुरुषोत्तम दक्षिणकर ने चार दिवसीय प्रकृति अध्ययन गतिविधि कार्यशाला के उदघाटन अवसर पर मुख्य अतिथि की आसंदी से व्यक्त किए। कार्यशाला का आयोजन हुडको स्थित डीएवी स्कूल प्रांगण में विज्ञान प्रसार एवं साइंस सेंटर द्वारा छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग के सहयाग से किया गया है।डॉ दक्षिणकर ने बताया कि नब्बे के दशक में उन्हें एकाएक वण्यजीवों के बीच जाने का मौका मिला। पहले तो इस कार्य में उन्हें कोई रुचि नहीं थी पर जब उन्होंने जंगल के पौधों, वन्यजीवों को करीब से देखा तो कई नए रास्ते निकल आए। उन्होंने देखा कि कमजोर दुबले पतले हिरण एक खास किस्म की घास खाते हैं। रासायनिक विश्लेषण से पता चला कि इस घास में प्रोटीन की मात्रा अधिक है। हिरणों को पता है कि किस घास में क्या है। इससे अध्ययन और शोध की नई राह निकली और उन्होंने 27 प्रकार की घासों का अध्ययन किया।
घास पर अपने अध्ययन से उत्साहित होकर उन्होंने बाघों के मल का भी अध्ययन किया। उसमें फीता कृमि तो मिला ही पर साथ में कुछ वनस्पति भी मिली। अध्ययन करने पर पता चला कि उक्त वनस्पति में पेट के कीड़े मारने के गुण हैं। यही रसायन पेट के कीड़े मारने वाली दवाओं में होता है। उन्होंने शोध किया और इस ज्ञान का पेटेन्ट भी करा लिया। गौरैया पक्षी की तेजी से गिरती संख्या का अध्ययन करने पर पता चला कि रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग इसका कारण है। अधिकांश गौरैया के अंडों में अब कवच नहीं होता जिसके कारण उन्हें सेना मुश्किल हो जाता है।
डॉ दक्षिणकर ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक बाघ के तीन शावक भटक गए थे। वन विभाग ने उन्हें पिंजरे में रखकर पाला। जब वे बड़े हो गए तो उन्हें वापस जंगल में छोड़ने की बात आई। पर इससे पहले यह पता करना जरूरी था कि क्या वे जंगल में जीवनयापन कर पाएंगे। प्रयोग के तौर पर पहले पिंजरे में मुर्गी छोड़ी गई। बाघ मुर्गी के साथ खेलने लगे। फिर एक बकरी छोड़ी गई तो बाघ उससे डरकर कोने में जा बैठे। बाघों को इसके बावजूद जंगल में छोड़ दिया गया पर वे फिर से लौटकर पिंजरे में आ गए। साफ था कि जीनोटाइप बाघ का होने के बावजूद परवरिश अलग पर्यावरण में होने के कारण जीन बेअसर हो गए थे। वस्तुतः बाघ के बच्चे लगभग डेढ़ साल की उम्र तक अपनी मां के साथ रहकर शिकार करना और जंगल में जीवन यापन करना सीखते हैं। यह अनुभव भी काम आया। कुछ समय बाद जब कुएं में गिरी एक बाघिन का उद्धार किया गया तो उसे तत्काल उसके परिवेश में छोड़ दिया गया। डॉ दक्षिणकर ने बताया कि रोएंदार जानवरों के बाल ग्रीष्म में झड़ते हैं। इसका भी वैज्ञानिक कारण है। इन पशुओं की त्वचा से पसीना नहीं निकलता जबकि इंसान पसीना निकालकर अपने शरीर को ठंडा कर लेता है। पशुओं को गर्मी से बचाने का यह प्राकृतिक तरीका है कि उनके कुछ बाल झड़ जाते हैं और उनका शरीर ठंडा हो जाता है।
डॉ दक्षिणकर ने नागपुर में वाइल्ड लाइफ रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेन्टर की स्थापना की है। उन्होंने कहा कि प्रकृति का अध्ययन करते समय एक पाकेट डायरी रखनी चाहिए। गहन अवलोकन से प्राप्त बिंदुओं को इसमें नोट करना चाहिए। यह जानकारी उस समय बेकार लग सकती है पर आगे चलकर इन अनुभवों का लाभ जरूर मिलता है। बच्चों में इस तरह के गुण विकसित करने पर विज्ञान के क्षेत्र को काफी लाभ हो सकता है।
प्रकृति अध्ययन कार्यशाला के प्रथम दिवस छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के पूर्व महानिदेशक डॉ एम एल नायक ने अपने रोचक अनुभव साझा किये। भारत सरकार के विज्ञान प्रसार (नई दिल्ली) के निदेशक डॉ बी के त्यागी, डीएवी संस्थाओं के सहायक क्षेत्रीय अधिकारी प्रशांत कुमार, साइंस सैंटर की सचिव संध्या वर्मा, संयोजक डॉ डी एन शर्मा ने भी उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। चार दिवसीय कार्यशाला में कवर्धा, राजनादगांव , बालोद, बेमेतरा एवं दुर्ग जिले के 55 शिक्षक भाग ले रहे हैं जो इसे आगे अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाएंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *