इंस्पेक्टर राज और बासी पाठ्यक्रम से बीमार हो रही उच्च शिक्षा : श्रीलेखा

एमजे कालेज के शिक्षा विभाग में नई शिक्षा नीति पर संगोष्ठि

 भिलाई। शिक्षण संस्थान विभिन्न नियामक एजेंसियों के बीच फंसकर उगाही का दंश झेल रहे हैं। इसके साथ ही बासी आउटडेटेड पाठ्यक्रमों ने शिक्षा को नीरस कर दिया है। इन दोनों स्थितियों को उलटे बिना उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती। उक्त बातें एमजे कालेज की डायरेक्टर श्रीलेखा विरुलकर ने महाविद्यालय के शिक्षा संकाय द्वारा उच्च शिक्षा नीति पर आयोजित संगोष्ठि में व्यक्त किये। इस संगोष्ठि का आयोजन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशानुसार किया गया था।भिलाई। शिक्षण संस्थान विभिन्न नियामक एजेंसियों के बीच फंसकर उगाही का दंश झेल रहे हैं। इसके साथ ही बासी आउटडेटेड पाठ्यक्रमों ने शिक्षा को नीरस कर दिया है। इन दोनों स्थितियों को उलटे बिना उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती। उक्त बातें एमजे कालेज की डायरेक्टर श्रीलेखा विरुलकर ने महाविद्यालय के शिक्षा संकाय द्वारा उच्च शिक्षा नीति पर आयोजित संगोष्ठि में व्यक्त किये। इस संगोष्ठि का आयोजन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशानुसार किया गया था।  भिलाई। शिक्षण संस्थान विभिन्न नियामक एजेंसियों के बीच फंसकर उगाही का दंश झेल रहे हैं। इसके साथ ही बासी आउटडेटेड पाठ्यक्रमों ने शिक्षा को नीरस कर दिया है। इन दोनों स्थितियों को उलटे बिना उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती। उक्त बातें एमजे कालेज की डायरेक्टर श्रीलेखा विरुलकर ने महाविद्यालय के शिक्षा संकाय द्वारा उच्च शिक्षा नीति पर आयोजित संगोष्ठि में व्यक्त किये। इस संगोष्ठि का आयोजन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशानुसार किया गया था।श्रीमती विरुलकर ने कहा कि हम 40 साल पहले भी बाबर-हुमायूं-अकबर पढ़ रहे थे। आज भी वही पढ़ रहे हैं। कम्प्यूटर साइंस दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है और हम आज भी चाल्र्स बैबेज में फंसे हुए हैं। तकनीकी समेत अधिकांश पाठ्यक्रमों का यही हाल है। सिलेबस का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। बच्चे किताब पढऩा नहीं चाहते, प्रश्नपत्र बनाने वाले भी कुंजी और अन्साल्व्ड से प्रश्न पत्र तैयार कर रहे हैं। इसी से पढ़ाई हो रही है, इसीकी परीक्षा हो रही है और बच्चे पास हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आज सभी कालेजों में उच्चतम मानकों पर खरा उतरने वाले प्राध्यापकों की फौज बेकार पड़ी है। विद्यार्थियों के अभाव में उसका ज्ञान किसी के काम नहीं आ रहा। शासन ने प्रत्येक शिक्षण संस्थान पर इतनी एजेंसियां लगा रखी हैं कि उनकी नाम्र्स पूरा करते करते प्रबंधन थक जाता है। दुख की बात यह है कि यह पूरा तामझाम धरा का धरा रह जाता है।
संगोष्ठि की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य डॉ कुबेर सिंह गुरुपंच ने कहा कि पाठ्यक्रम छात्रों की रुचि के अनुसार हो, उपयोगी हो और रोजगारपरक हो तो विद्यार्थी कक्षा में आने के लिए प्रेरित होंगे। शिक्षा को राजनीति से मुक्त होना चाहिए। शिक्षण संस्थाएं अपनी पूरी क्षमता और साधन का उपयोग केवल शिक्षण की गुणवत्ता सुधार के लिए कर सकें। पाठ्यक्रम से आउटडेटेड हिस्सों को हटा कर उसे निरंतर अपडेट करने की बात भी उन्होंने कही।
शिक्षा विभाग की प्रभारी डॉ श्वेता भाटिया ने कहा कि आज सबसे बड़ी समस्या रोजगार से विषयों का कट जाना है। अधिकांश विषयों के विद्यार्थी रोजगारमूलक पाठ्यक्रमों के पीछे भाग रहे हैं। ऐसे में प्रत्येक विषय को रोजगार की दृष्टि से संवारना होगा। इसके लिए पाठ्यक्रम तय करने वालों को, मूल्यांकन करने वालों को अतिरिक्त मेहनत करनी होगी।
सहा. प्राध्यापक डॉ जेपी कन्नौजे ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को निजी क्षेत्र और सरकार ने केवल कमाई का जरिया बना रखा है। इस स्थिति में भी सकारात्मक परिवर्तन किए जाने की जरूरत है।
संगोष्ठि में सहा. प्राध्यापक अर्चना त्रिपाठी, ममता एस राहुल, उर्मिला यादव, शकुन्तला जलकारे, नेहा महाजन, मंजू साहू, गायत्री गौतम, सौरभ मंडल, दीपक रंजन दास ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

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